Wednesday, September 16, 2009

माँ शारदामणिदेवी

कलकत्ता के पास जयरामबाटी नामक छोटे से देहात में 1853 में माँ शारदामणिदेवी का जन्म हुआ था। बचपन से ही उनका जीवन भक्तिभाव और सादगी से परिपूर्ण रहा। 1859 में रामकृष्ण देव से विवाह के पश्चात यह जीवन अधिक गौरवशाली, उज्ज्वल और पवित्रता का प्रतीक स्वरूप पूरे भारत ही नहीं बल्कि सारे विश्व में विख्यात हुआ।
वैवाहिक जीवन में उन्नत आध्यात्मिक प्रेम का महत्व श्री रामकृष्ण और शारदादेवी के विवाह ने प्रस्थापित किया है। बच्चों को जन्म दिये बिना मातृत्व की गरिमा और आनन्द की मिसाल उन्होने दुनिया के सामने रखी। जाति भेद, वर्ण भेद, धर्म भेद से परे ज्ञान अज्ञान से अतीत उन्होने कई बच्चो को अपनाया और जगत की माँ के रूप में अपने आप को स्थापित किया। दैवी शक्ति ने माँ शारदा के रूप में अवतरित होकर यह अनूठा और अनोखा व्यक्तित्व दुनिया के सामने प्रस्तुत किया और भारत की उज्ज्वल नारी परंपरा में माँ शारदादेवी का नाम भी जुड ग़या।
माँ शारदा देवी के जीवन में उनके अति विकसित प्रेमभाव ने ऊंच नीच ज्ञान अज्ञान धर्म अधर्म की सीमायें पार कर ली थी। उनकी शरण में आनेवाला हर व्यक्ति उनके लिये पुत्र के समान था। उनकी अपार कृपा-सागर की बूदें हर एक झुलसे हुए मन को शांति प्रदान करने का सार्मथ्य रखती थीं। मनुष्य की कमजोरी और उनके अपराध वे बडी बखूबी नजरअंदाज कर देती थी। और फिर अपने वात्सल्य से वे शांतिभाव प्रदान करती थी। अनेक चोर बदमाश उनके वात्सल्य और ममता भरे व्यवहार से सुधार के रास्ते पर चलने लगे थे।
इनमे अमजद डाकू को जीवन परिवर्तन की कहानी बहुत प्रसिध्द है। माँ शारदामणिदेवी ने अमजद के द्वारा भक्तिपूर्वक लाए हुए फल-फूल को प्रेम से स्वीकार किया और उससे कभी घृणा नहीं की। यह सब देखकर अमजद और उसके साथी आश्चर्य और आनन्द से भरमा गये थे। उन्होने श्री माँ के घर की दिवारों की भी मरम्मत भी की।
एक दिन अमजद को माँ ने खाने पे बुलाया। अपनी भतीजी नलिनी को माताजी ने उसे खाना परोसने को कहा। जात पात में विश्वास रखने वाली नलिनी अमजद की थाली में रोटी दूर-दूर से ही फेंक रही थी। यह देखा माँ को बडा कष्ट हुआ। वे नलिनी से बोली ''अरे वाह रे नलिनी, इस तरह फेंक कर परोसने से क्या किसको अच्छा लगेगा? वह क्या प्रसन्नता से भोजन कर पायेगा? ला मुझे दे मे परोसती हूं मेरे बेटे को।'' ऐसा कह कर माँ ने दुलार से अमजद के पास बैठकर उसे पंखा किया और खाना परोसा।
अमजद की कुछ कमजोरियां फिर भी वैसी ही रहीं। एक बार उसे पुलिस पकड कर ले गयी तो माँ को उसकी बडी चिन्ता हुई। जब जेल से छूटकर वह वापस आया तब जाकर कही माँ को राहत मिली। अमजद के अंतिम दिन माँ और ईश्वर की भक्ति में गुजरे।

Tuesday, September 15, 2009

मां काली के दर्शन

भारत में कलकत्ता से 60 मील की दूरी पर बसा है एक गाँव कामारपुकुर। यहॉ सन 1836 में 18 फरवरी को श्री रामकृष्णदेव का जन्म हुआ था। पिता थे क्षुदीराम और माता चन्द्रामणीदेवी। बचपन में बालक गदाधर- श्री रामकृष्ण का बचपन का नाम - स्वस्थ, सुदृढ और उत्साह से परिपूर्ण थे। अपने साथियों के साथ खेत खलिहान में खेलना क़ृष्ण तथा शंकर भगवान की लीला पर आधारित छोटे छोटे नाटक रचना ज़गन्नाथपुरी की यात्रा पर निकले साधुओ के साथ रहना और उनकी सेवा करना यह गदाधर के बचपन की विशेषतायें थी। इन्ही दिनों उन्हे एक बार धान के खेत में सुन्दर नैसर्गिक सौंदर्य निहारते हुए और एक बार नाटक में शिव की भूमिका निभाते हए अचानक समाधि की अवस्था प्राप्त हुई थी। परिवार जन इस मूर्छा को मिरगी की बीमारी समझकर उन्हे हकीम वैद्य के पास ले गये लेकिन बालक रामकृष्ण ने कहा ''मुझे कुछ नहीं हुआ मै स्वस्थ हूं।''
श्री रामकृष्ण की स्मरण शक्ति बहुत तेज थी। वे एक बार जो गीत क़था या वर्णन सुन लेते तो उन्हे वह हमेशा के लिये याद हो जाता। उसी प्रकार उनकी वाणी अतिशय मधुर थी और गीत गाने का अन्दाज बहुत न्यारा। आसपास के सभी लोग उनकी आवाज के जादू से मोहित हो जाते। रामकृष्ण एक अच्छे अदाकार भी थे। पौराणिक प्रसंगो को वे बखूबी स्त्री एवम् पुरूष दोनो की अदा में प्रस्तुत कर सकते थे। उनकी अदाकारी के बखान गाँव के सभी छोटे बडे करते।
बचपन में उन्हे गाँव की प्राथमिक पाठशाला में दाखिल कराया गया। वहॉ वे बंगला पढना लिखना सीख गये किन्तु गणित उन्हे कभी रास नहीं आया। व्यवहार की भाषा और सौदेबाजी से उन्हे बचपन से ही नफरत थी। अंकगणित में उन्हे लेन देन का ओछापन नजर आता। इन्ही दिनो उनके पिता चल बसे। बडे भाई रामकुमार को रामकृष्ण की फिकर थी।  रामकुमार संस्कृत में विशेष पारंगत थे और उन्होने कलकत्ता में एक संस्कृत पाठशाला शुरू करने की योजना बनाई थी। इस सिलसिले में रामकुमार सन 1852 में रामकृष्ण को अपने साथ लेकर कलकत्ता पहुंचे।
दक्षिणेश्वर स्थित काली मंदिर पाठशाला की आमदनी से उनका गृहस्थ जीवन सुचारू रूप से नहीं चलता था। धन की कमी से उन्होने काली मंदिर में पुजारी की नौकरी कर ली थी। 1855 में 9 लाख रूपये की लागत से रानी रासमणी ने दक्षिणेश्वर स्थित लाजवाब काली मंदिर बंधवाया था। शास्त्र के अनुसार एक ब्राम्हण पुजारी ही मा काली और राधाश्याम की विधिवत पूजा अर्चना कर सकता था। सो रामकुमार को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। किन्तु रामकुमार के अचानक मृत्यु के कारण रानी के जवाई मथुरनाथ ने श्री रामकृष्ण को मा काली की पूजा अर्चना का भार सौंपा।
वैसे तो हर मंदिर में एक पुजारी होता है जो उस में प्रतिष्ठित देवता या देवी की आराधना पूजा और अर्चना में अपने आप को लगाये रहता है। लेकिन इस कार्य में पुजारी केवल एक नौकर भर रहता है और कुछ मासिक आमदनी के लिये वह कार्य करता है। लेकिन श्री रामकृष्ण देव की बात असाधारण थी। वे घंटो मा काली की पाषाण मूरत को निहारते और पत्थर में चिन्मयी मां को तलाशते। इस कठोर व्रत में वे अपना देहभान भूल जाते। शरीर और देह की भूख का उन्हे खयाल भी न आता और रह जाती बाकी केवल हृदय की तडप। ''क्या मा पाषाण की केवल एक मूर्ति हैं या वह सचमुच जगतजननी हैं। क्या वह भक्त की आराध्या नहीं क्या वह साधक का साध्य नहीं'' ऐसे कई विचार और प्रश्न रामकृष्ण देव के मन को भ्रमित करते।
वे अतिउत्कंठा से मा से कहते ''मा क्या इस बालक को अपना असली स्वरूप नहीं बताओगी। मै नादान अज्ञानी हूं। मुझे ज्ञान से परिपूर्ण कर दो। मुझे दर्शन दो मां। हे मां मुझे दर्शन दो। यह कहते कहते भूख और कमजोरी से प्रभावित मनसे अशांत रामकृष्ण मा काली की मूर्ती के समक्ष दिल खोलकर जोरजोर से रोते जैसे बालक अपनी सचमुच की मां से बिछड ग़या हो। मंदिर में उपस्थित अन्य लोग रामकृष्ण के उस अनोखो व्यवहार को समझ नहीं पाते और उन्हें पागल तक कहते।
दिन बीतते गये और साथ में श्री रामकृष्ण देव की व्याकुलता भी। अब मा से दूरी उनके लिये असह्य होने लगी और एक दिन भावावेष में उनकी नजर मां काली के मंदिर में स्थित खड्ग पर पडी। ''मा दर्शन दे अन्यथा जीवन जीने में क्या लाभ। यह देख अब मुझे जीने की कोई चाह नहीं रही। इस खड्ग से मै मेरे जीवन का अन्त कर रहा हूं।'' सो कहकर अब श्री रामकृष्ण देव अपनी गर्दन पर वार करने ही वाले थे कि स्वयं मा काली उनके सन्मुख प्रकट होकर बोली ''बेटा रामकृष्ण यह क्या कर रहे हो। यह देख तेरी मां तेरे सामने खडी है। फेंक दे वह तलवार।''
श्री रामकृष्ण देव एक असाधारण मनस्थिति में पहुंच चुके थे। वह दैवी भाव था जहॉ संसार के परे आध्यात्मिक जीवन शुरू होता है। उन्होने देखा कि मंदिर छज्जे दिवारें सारा कुछ एक अपूर्व और अलौकिक प्रकाश में विलीन होता जा रहा है। चिन्मय प्रकाश के सागर में उन्हे सारा संसार अनेक लहरों में व्याप्त दिखाई देने लगा। चारो ओर से आनन्द की लहरे उमड रही थी और उनकी ओर बढ रही थी। मां मां कहते कहते श्री रामकृष्ण देव आनंद समाधि में लीन हो गये।
कुछ समय पश्चात श्री रामकृष्ण देव को होश आया। अब उन्हे सर्वत्र मां काली का हंसता खेलता रूप नजर आता। मां की अभयदायी मूर्ति उन्हे सब ओर नजर आती। और मां काली ही तत्पश्चात उनकी मित्र गुरू और सखा बन गयी।

Friday, September 11, 2009

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम

रघुकुल की महान परंपरा में अयोध्या नगरी में पिता दशरथ ओर माता कौशल्या के यहॉ श्रीराम अवतरित हुए। उस समय अयोध्या राज्य में सब ओर सुख शान्ति थी। लेकिन सुदूर दक्षिण भारत में लंकापति रावण आसुरी वृत्तियों को बढाने में लगा था। वह अतिशक्तिमान राक्षसराज धीरे धीरे उत्तर में भी अपना कुप्रभाव फैलाने में सफल हो रहा था जिसके चलते भारतके दक्षिण में स्थित अनेक राज्य और उनके निवासी राजा रावण के राक्षसी प्रभाव का शिकार बनते नजर आ रहे थे। ऐसे में प्राचीन भारत की महान संस्कृति का प्रचार और प्रसार करने की जिम्मेदारी निभाने के लिये प्रभु को स्वयं श्रीराम के रूप में अवतरित होना पडा।
भारत को भौगोलिक राज्यों को एकसूत्र में बांधने का अधिकांश श्रेय भगवान राम को ही जाता है। अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीता के साथ 14 बरस उन्होने लगभग संपूर्ण भारत का भ्रमण किया जगह जगह सात्विकता को बढावा देते तामसिक वृत्तियों का संहार किया। एक ओर ॠषिमुनि जनों का आदर किया तो दूसरी ओर राक्षसों को दण्डित भी किया। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य समाज के साथ पिछडे वर्ग के लोगों को साथ लेकर उन्होने सामाजिक क्रान्ति की नींव रखी। ठोस उदाहरण देने हो तो आदिवासी सरदार गुह  नौका खेनेवाला केवट  भक्त शबरी  वानर जाति के सुग्रीव और अंगद   रीछ जाति के जाम्बुवंत   पक्षी जाती के जटायु आदि सब जन के साथ श्रीराम का प्रेमपूर्ण सद्भाव और मैत्री का व्यवहार रहा। ये सब एकजुट होकर श्रीराम के कार्य में लगे रहे। सीताहरण और उसके चलते उसकी तलाश में जहॉ राम लक्ष्मण स्वयं वन में पैदल भटके वहीं इन सब पिछडी जाति के सदस्यों ने उनकी निष्काम भाव से सहायता की। रामसेतु और लंकाविजय को सामूहिक और सांघिक एकजुटता की विजय का प्रतीक हम मान सकते हैं।
ऐसे मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के जीवन के कुछ पहलूओं का हम संक्षेप में अध्ययन करेंगे।
  1. राजपुत्र होने के नाते श्रीराम का बचपन सुख और समृध्दि में बीता। इस बचपन की दो विशिष्टताएं थी। एक तो राम  लक्ष्मण  भरत और शत्रुघ्न इन चारो भाईयों का अनोखा बंधुप्रेम। मानो चार शरीर और एक आत्मा। माता कैकयी के अपने बेटे भरत को राजसिंहासन देना और राम को वनवास सुनाना यह एक विचित्र संकट था। किन्तु राम और भरत का प्रेम इन लौकिक स्वार्थ से ऊपर उठकर था। सो भरत ने अयोध्या नगरी के बाहर एक आश्रम में सन्यासी जैसे रहकर राम के स्थान पर 14 साल राजपाठ संभाला।
  2. किशोर अवस्था में अरण्यवासी ॠषिमुनीओं के यज्ञ में विघ्न खलेल डालने वाले राक्षसों का राम लक्ष्मण ने संहार किया और आर्यव्रत की यागयज्ञ रिति को अबाधित रखने में सहायता की।
  3. सीता स्वयंवर में पराक्रम और शालीनता का सुरीला संगम बनाते हुये एकपत्नीव्रत जैसी महान सामाजिक परंपरा की नींव रखी।
  4. केवल एक दिन में ही एक ओर राज्याभिषेक जैसी अतिआनंददायी तो दूसरी ओर अतिकठोर वनवास की आज्ञा ऐसे पूर्णतः विपरित आदेशो का निःसंकोच और स्थितप्रज्ञभाव से पालन करना केवल अवतार पुरूष को ही संभव हो सकता है। कुल की मर्यादा और शान के खिलाफ और प्राण जाये पर वचन न जाई इस रघुकुल की रीति पर ऑंच न आये इस प्रयत्न में श्रीराम सफल हुए। सत्यवादी दृढनिश्चयी पराक्रमी बंधुप्रेम से ओतप्रोत श्रीराम ने घरगृहस्थी समाज राजकारण और धर्म की किसी भी सीमा का उल्लंघन नहीं किया। इसके चलते वे मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाये।
  5. वनवास
    पिता के वचन का आदर और माता कैकेयी की आज्ञा का पालन करने के लिये श्रीराम ने चौदह बरस के वनवास को भी बडी सहजता से स्वीकार किया
    । बंधुप्रेम से प्रेरित लक्ष्मण और अर्धांगिनी होने के नाते सीता को श्रीराम अपने साथ वन ले गये। यहाँ एक आदर्श गृहस्थ पती भाई और गणनायक के रूप में श्रीराम ने जीवन बिताते अपने व्यक्तिमत्व में चार चाँद लगाये।
चौदह बरस धर्मपत्नी के सहवास में रहनेपरभी वल्कलधारी मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम और माता  सीता संन्यास आश्रम का पालन करते हुए शरीर सुख का त्याग करते है। यह उदात्तता भारतीय संस्कृति को छोड शायद ही किसी अन्य संस्कृति में पाई जाती हो। ध्येयवादी राम अरण्य में भी ॠषिमुनीओं के आश्रम को भेंट देते और वेद उपनिषद के गहन तत्वों की चर्चा करते। इससे वेदो का अध्यात्मिक ज्ञान सारे भारत में फैला और आर्यसंस्कृति का सदूर प्रसार एवम् प्रचार हुआ।

सीता के अपहरण में अहंकारी रावण और भौतिकता के शिकार राक्षस
गण को सबक सिखाने का हेतु निहित था। स्वार्थपरायणता में डूबा रावण इस बात को भूल गया था कि वेदाभ्यास शरीरसुख उपभोग के लिये नहीं बल्कि अपनी आंतरिक दैवी प्रतिभाको उद्धृत करने के लिये होता है। अनेक रानियाँ होनेपर भी सीता का हरण कर के उससे जबरदस्ती शादी करने का मोह इस बात का प्रमाण था कि संसार के सारे सुख खुद ही उपभोगना यही उसके लिये एकमात्र जीवन का उद्देश्य था। 
  1. जहॉ एक ओर दशानन रावण को श्रीराम ने नष्ट किया वहीं उसी के भाई विभीषण को गले लगाया। इससे यह साफ जाहिर होता है कि श्रीराम ने रावण का वध उसका राज्य हडपने के वास्ते नहीं किया था बल्कि धर्म की स्थापना के लिये यह आवश्यक सा हो गया था।

Thursday, September 10, 2009

मन वारिधि की महामीन

मीरांबाई
मीरां अपने कालखण्ड का एक ऐसा ज्योतिपुंज है, जिससे हर किसी ने प्रकाश चुरा कर स्वयं को प्रभासित करने के साथ-साथ अपने हिस्से का अंधकार भी प्रदान करने में कोई संकोच नहीं किया। मीरां की यश पताका को अपने-अपने गृहों पर सुशोभित कर उसे अपना बनाने की ललक, इस मनस्विनी को अनेक विरोधाभासी जनश्रुतियों से जोडती चली गई। इस प्रयास में मीरां को लेकर काल्पनिक कथाएं गढी ही नहीं गई, उन्हें प्रमाणित करने के लिये उनके नाम से अनेक रचनाएं तक कर डालीं।
मीरा की अपूर्व ख्याति का सभी अपने-अपने हिसाब से दोहन करते रहे। परिणाम स्वरूप मीरां के सहज-सरल जीवन को उपन्यास जैसा चटपटा किन्तु यथार्थ से परे बनाने में कोई कसर बाकि नहीं रखी। एक ओर वे भगवान कृष्ण की अनन्य प्रेमिका के साथ ब्रज गोपी का अवतार मानी गईं तो दूसरी ओर उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिये काशी के चौक में सन्त रैदास को गुरू बनाते भी दिखाया गया। एक ओर स्वयं हरि गरुडारूढ होकर उन्हें विषनिद्रा से जगाने आते हैं, दूसरी ओर साधारण से परामर्श के लिये उन्हें सैंकडों मील दूर काशी में तुलसीदास के पास पत्रवाहक दौडाना पडता है। इसी प्रकार मीरां का वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित होना, बादशाह अकबर का तानसेन के साथ छद्म वेश में चित्तौड आना, मीरां का तुलसीदास से मार्गदर्शन हेतु पत्र व्यवहार, वृंदावन में मीरा और जीव गोस्वामी प्रकरण आदि भी इसी प्रयास की कडियाँ हैं।
सम्वत् 1590-60 के आस-पास मेडता के शासक राव दूदा के चतुर्थ पुत्र राव रत्नसिंह की पत्नी के गर्भ से जन्मी मीरां ने बचपन के खेल-खेल में गिरधर का वरण कर लिया। सम्वत् 1573 में महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ विवाह के सात वर्ष बाद 1580 में मात्र बीस वर्ष की आयु में वह विधवा हो गई। कृष्ण के पारलौकिक प्रेम में निमग्न विधवा मीरा को प्रताडनाओं के साथ सर्प और विषपान जैसी परीक्षाओं से गुजरना पडा। सम्वत् 1590 के आसपास अपने ताऊ राव वीरमदेव का निमंत्रण पाकर वे मेवाड त्याग कर, पितृगृह मेडता में रहने लगी। किन्तु सम्वत् 1695 में राव मालदेव द्वारा मेडता विजय के बाद वे पुन: लौकिक पतिगृह जाने के स्थान पर अपने पारलौकिक पति गिरधर नागर की क्रीडास्थली वृन्दावन प्रस्थान कर गईं। प्रेम दीवानी मीरां को वृन्दावन बहुत रास आया। किन्तु सम्वत् 1600 में वे द्वारका के लिये प्रस्थान कर गईं। अपना शेष जीवन उन्होंने द्वारका में रणछोडज़ी के सामने नृत्य करते बिताया और सम्वत् 1630 में वे प्रिय के इसी विग्रह में विलीन हो गईं।
मीरा के इस सत्तर वर्षीय जीवन को लेकर जनश्रुतियों के द्वारा उत्पन्न भ्रान्तियों की भरमार से इस सहज-सरल समर्पिता को भी विवादास्पद बनाने के प्रयास भी अनजाने ही होते रहे हैं। मीरां की प्रसिध्दी को अपनी यशवृध्दि का माध्यम बनाने के प्रयासों में ऐसा बहुत कुछ जोडा जाता रहा, जिसकी पुष्टि किसी भी साक्ष्य से नहीं होती। उदाहरणार्थ मीरां के वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित होने की जनश्रुति को ही लें। कृष्णभक्त होने के कारण मीरां के पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने का प्रचार, वस्तुत: मीरा की प्रसिध्दि में सहायक बनाने के लिये किया गया था।
पुष्टिमार्ग के प्रमुख ग्रन्थ  चौरासी वैष्णवन की वार्ता  में मीरां सम्बन्धी प्रसंग इस जनश्रुति को मिथ्या प्रमाणित करते हैं। वे प्रसंग इस प्रकार हैं -
गोविन्द दुबे सांचोरा ब्राह्मण तिनकी वार्ता और एक समें गोविन्द दुबे मीरांबाई के घर हुते तहां मीरांबाई सों भगवद्वार्ता करत अतके। तब श्री आचार्य जी ने सुनी जो गोविन्द दुबे मीरांबाई के घर उतरे हैं सो अतके हैं, तब श्री गुंसाईजी ने एक श्लोक लिखी पठायो, सो एक ब्रजवासी के हाथ पठायो। तब वह ब्रजवासी चल्यौ सो वहाँ जाय पहुंचै। ता समय गोविन्द दुबे सन्ध्यावन्दन करते हुते, तब ब्रजवासी ने आय के वह पत्र दीनो, सो पत्र बांचि के गोबिंद दुबे तत्काल उठे, तब मीरांबाई ने बहुत समाधान कियो, परि गोबिन्द दुबे ने फिर पाछें नहीं देखो। प्रसंग 2, चौरासी वैष्णवन वार्ता, डाकोर सं 1930, पृष्ठ 126-127)
अथ मीरांबाई के पुरोहित रामदास तिनकी वार्ता
सो एक दिन मीरांबाई के श्री ठाकुर जी आगे रामदासजी कीर्तन करत हुते सो रामदासजी श्री आचार्यजी महाप्रभून के पद गावत हुते, तब मीरां बाई बोली जो दूसरो पद श्री ठाकुर कौ गावो। तब रामदास ने कह्यो मीरांबाई सों, तो यह कौन को पद है? जो जा आज से तेरो मुंहडों कबहूँ न देखूंगो, तब तहां ते सब कुटुम्ब को लै के रामदास जी उठि चले, तब मीरां बाई ने बहुतेरो कह्यो परि रामदासजी रहे नाहीं। पछे फिरी वाको मुख न देख्यो। ऐसे अपने प्रभुन सों अनुरक्त हुते। सो वा दिन तें मीरांबाई को मुख न देख्यो, वाकि वृत्ति छोड दीन्ही, फेर वाके गाँव के आगे होय के निकसे नाहीं। मीरांबाई ने बहुत बुलाये परि वे रामदासजी आए नाहीं। तब घर बैठे भेंट पठाई सोई फेर दीन्हीं और कह्यो जो तेरो श्री आचार्यजी महाप्रभून उपर समत्व नाही जो हमको तेरी वृत्ति कहा करनी है।(प्रसंग 1 चौरासी वैष्णवन वार्ता, डाकोर सं 1930, पृष्ठ 131-132)
ऐसा ही एक और प्रसंग है। अथ कृष्णदास अधिकारी तिनकी वार्ता
सो वे कृष्णदास शूद्र एक बेर द्वारका गए हुते सो श्री रणछोरजी के दर्शन करिके तहां से चले सो आपन मीरांबाई के गांव आये सो वे कृष्णदास मीरांबाई के घर गए तहां हरिवंश व्यास आदि वैष्णव हुते सो काहू को आयै दस दिन भये, काहू को पंद्रह दिन भये हुते तिनकी विदा न भई हुती और कृष्णदास ने तो आवत ही कही जो हूं तो चलूंगौ। तब मीरांबाई ने कही जो बैठो तब कितनेक मोहर श्रीनाथ को देन लगी सा कृष्णदास ने न लीनी और कह्यो जो तू श्री आचार्यजी महाप्रभून की सेवक नांही होत ताते भेंट हम हाथ ते छुवेंगे नाहीं। ऐसे कहिके कृष्णदास उहां से उठि चले। (प्रसंग 1 चौरासी वैष्णवन वार्ता, डाकोर सं 1960)
उपरोक्त प्रसंग मीरां के वल्लभाचार्य की शिष्या होने और पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने सम्बंधी जनश्रुति का खण्डन करते हैं। ब्रज और गुजरात में मीरां को प्राप्त यश वस्तुत: वल्ल्भ सम्प्रदाय के प्रसार में बाधक हो रहा था। ये दोनों ही क्षेत्र पुष्टिमार्ग के गढ बन रहे थे। इस सम्प्रदाय के अराध्य तो कृष्ण ही थे, जबकि मीरां की कृष्णभक्ति आम जन में सर्वाधिक आदर से देखा जा रहा था। कृष्णभक्ति का परचम उठाए श्रीमद् वल्लभाचार्य स्वयं को नन्दबाबा कह कर कृष्ण द्वारा प्रतिदिन उनका बनाया भोजन स्वयं आकर ग्रहण करने का दावा करते थे, जबकि उनके अनुयायी महाप्रभु जी को कृष्ण का अवतार ही घोषित कर रहे थे। ऐसे में मीरां जैसी कृष्ण समर्पिता का वल्ल्भाचार्य और उनके पुष्टिमार्ग को स्वीकार न करना पुष्टिमार्ग के प्रसार में बाधक हो रहा था। इस बाधा को दूर करने के लिये मीरां को महाप्रभुजी की शिष्या होना प्रचारित किया जाने लगा।
इसी प्रकार सन्त रैदास को मीरां द्वारा गुरू रूप में स्वीकार किये जाने की जनश्रुति भी रैदास की महत्ता बढाने के लिये गढी ग़ई प्रतीत होती है। इस जनश्रुति का मूल आधार मीरां के नाम से प्रसिध्द कुछ स्फुट पद हैं:-
1 मेरो मन लागो हरिजी सूं , अब न रहूंगी अटकी।
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।।( मीरां शब्दावली, वेलडियर प्रेस पृ 25)
2 गुरू रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिडी।
सतगुरू सैन दई जब आकें, जात में जोत जली।।
3 रैदास सन्त मिले मोंहिं सतगुरू दीन्हा सुरति सहदानी।
गुजरात में भी मीरां का एक पद प्रसिध्द है -
झांझ पखावज वेणु बाजिया, झालरनो झनकार।
काशी नगर के चौक मां मने गुरू मिलिया रोहिदास
।।
किन्तु काशी के चौक में मीरां को गुरू रूप में रैदास का मिल पाना संभव ही नहीं था। कबीर के समकालीन रैदास का काल सम्वत् 1455 से 1575 के आसपास, लगभग 120 वर्ष माना गया है। रैदास की मृत्यु के समय मीरां की आयु 18 वर्ष से अधिक हो ही नहीं सकती और उस अवस्था में मीरां के पति जीवित थे, और वे मेवाड में ही थीं। इस समय मीरां का काशी जाना या 120 वर्षीय वृध्द रैदास का मेवाड आना दोनों ही असंभव सिध्द होते हैं। स्थान और काल के विचार से मीरां और रैदास का एक दूसरे के सम्पर्क में आना संभव नहीं था।
इन सब बातों से स्पष्ट है कि मीरा स्वतंत्र और उदार प्रकृति की महिला थीं। सम्प्रदाय के सीमित घेरों में बंधना उन्हें स्वीकार न था, सम्प्रदायों की सीमा से वे बहुत परे थीं। कितना ही प्रयत्न करके श्री वल्ल्भाचार्य जी के शिष्य उन्हें अपने सम्प्रदाय में न ला सके। प्रियादास ने भी भक्तमाल की टीका में मीरां को रैदास की शिष्या नहीं लिखा। इसके विपरीत उनकी पितामही सास, राणा सांगा की माता झाली रानी रत्नकुंवरी को रैदास की शिष्या लिखा है। यदि मीरां भी रैदास की शिष्या होती तो प्रियादास इसका उल्लेख करना कभी नहीं भूलते। रघुराज सिंह रचित भक्तमाल में भी मीरां के रैदास की शिष्या होने का उल्लेख नहीं है। केवल उपरोक्त स्फुट पदों में ही मीरां के रैदास की शिष्या होने का वर्णन मिलता है जो संभवत: रैदास के शिष्यों की रचनाएं हैं। यह संभव है कि अपनी विनम्र, उदार भावना के कारण उन्होंने सभी सम्प्रदायों की सत्संगति की होगी और बहुत संभव है कि अपनी पितामही सास झाली रानी के पास आने वाले रैदास के शिष्यों से वे प्रभावित हुई हों। किन्तु किसी सम्प्रदाय विशेष या गुरू विशेष की शिष्या बन कर रहना उनकी प्रकृति के अनुकूल नहीं था।
सन्त तुलसीदास और मीरांबाई के बीच पत्र व्यवहार की जनश्रुति का भी यथार्थ से दूर तक सम्बंध नहीं है। इसमें मीरां का अपने भक्तिमार्ग में आने वाले कष्टों का वर्णण करते हुए, उनसे मार्गदर्शन मांगती हैं। उत्तर में तुलसीदास - ताजिये ताहि कोटि बैरी सम, जधपि परम सनेही - पद भेज कर, मीरां को गृह त्याग का परामर्श देते हैं। इस पर्त्रव्यवहार का उल्लेख न तो प्रियादास की टीका में मिलता है और न ही रघुराजकृत  भक्तमाल  में।
बाबा वेणीमाधव रचित गुंसाई चरित में ही यह कल्पना साकार होती है कि सम्वत् 1616 में, मेवाड क़े सुखपाल नामक ब्राह्मण द्वारा मीरां ने पत्रिका भिजवाई थी, जिसका उत्तर तुलसीदास के पद के रूप में प्राप्त हुआ। बाबा वेणीमाधव ने तुलसी को सर्वश्रेष्ठ सिध्द करने हेतु अनेक कथाएं गढी थीं, जो स्थान, काल और पात्र की दृष्टि से विचार करने पर असंभव प्रतीत होती हैं। इन कथाओं में महाकवि केशव दास द्वारा एक ही रात में रामचंद्रिका जैसे वृहद महाकाव्य की रचना करके अस्सीघाट पर गुंसाई जी के दर्शनों को जाते हैं। रसखान को तीन वर्ष तक रामचरितमानस सुनना पडता है। इतना ही नहीं 75 वर्षीय महात्मा सूरदास को अपने अन्धत्व और वृध्दावस्था के बावजूद सूरसागर दिखाने, अपने से बहुत छोटी आयु के तुलसीदास के पास काशी आना पडता है। मीरां पर इतनी कृपा कैसे हो गई कि वे ब्राह्मण के हाथों पत्र भेज कर मुक्त हो गईं। वेणीमाधव ने उन्हें स्वयं काशी यात्रा करते नहीं बताया।
स्थान, काल और पात्र की दृष्टि से विचार करने पर भी यह कल्पना कपोल-कल्पित प्रतीत होती है। मीरां पर अत्याचारों की बात सम्वत् 1590 के पूर्व की है। सम्वत् 1591 से पूर्व ही मीरां मेवाड छोड कर जा चुकी थी। क्योंकि उस वर्ष हुए जौहर में मीरा सम्मिलित नहीं थी। इस प्रकार पत्र का अधिकतम सम्वत् 1591 हो सकता है, लेकिन  गुंसाई चरित  में सम्वत् 1616 का उल्लेख हुआ है। उस समय तो मीरां मेवाड में ही नहीं थी।
विद्वानों के बहुमत ने गोस्वामी जी का जन्म सम्वत् 1585 में माना, जबकि बाबा वेणीमाधव ने उनका जन्म 1554 बताया है। इस हिसाब से भी सम्वत् 1590-91 में वे पैंतीस-छत्तीस वर्ष के युवक मात्र थे। तब तक उन्होंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया था, जिससे मेवाड ज़ैसे सुदूर राज्य तक उनकी ख्याति पहुँच पाती। इसके विपरीत मीरां के मार्गदर्शन के लिये महाप्रभु वल्ल्भाचार्य, गोस्वामी विठ्ठलनाथ, महात्मा सूरदास, गुंसाई हितहरिवंश, स्वामी हरिदास जैसे महात्मा ब्रजमण्डल में उपलब्ध थे, जिन्होने उस समय तक काफी कीर्ति अर्जित कर ली थी।
कुंवर कृष्ण ने बाबा वेणीमाधव के कथन को सत्य और सुसंगत प्रमाणित करने के लिये अपने निबंध मीरांबाइ-जीवन और कविता में यह अनुमान लगाया कि जब ब्रजभूमि में मुगलपठानों के रण वाद्य बजने लगे तो संभवत: सन् 1612-13 के आसपास मीरां पुन: चितौड क़ी ओर रवाना हुई।  सम्भवत: इसी समय उन्होंने सुखपाल के हाथों पत्रिका भेजी हो जो तुलसीदास जी को स 1616 के बाद मिल सकी थी।
इस अनुमान में भी कुछ सत्य नहीं है क्योंकि मीरा वृंदावन से सीधे द्वारका चली गईं। उनके मेवाड फ़िर लौटने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। मीरां द्वारा पत्र व्यवहार की कल्पना तुलसीदास की महत्ता स्थापित करने के लिये की गई प्रतीत होती है।
इसी प्रकार वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन हेतु मीरां का जाना और उनके स्त्री मुख दर्शन निषेध सम्बंधी घटना में भी कल्पना का प्राधान्य दिखाई देता है। प्रचलित कथा के अनुसार मीरां वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन के लिये गईं। गोस्वामी जी सच्चे साधु होने के कारण स्त्रियों को देखना भी अनुचित समझते थे। उन्होंने अन्दर से ही कहला भेजा कि हम स्त्रियों से नहीं मिलते, इस पर मीरां बाई का उत्तर बडा मार्मिक था। उन्होने कहा कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं, यहां आकर जाना कि उनका एक और प्रतिद्वन्द्वी पैदा हो गया है। मीरां का ऐसा मधुर और मार्मिक उत्तर सुन कर जीव गोस्वामी नंगे पैर बाहर निकल आए और बडे प्रेम से उनसे मिले। इस कथा का उल्लेख सर्वप्रथम प्रियादास के कवित्तों में मिलता है -
'वृन्दावन आई जीव गुसाई जू सो मिल झिली, तिया मुख देखबे का पन लै छुटायौ
मुन्शी देवीप्रसाद मीरां बाई का जीवन चरित्र में लिखते हैं - एक दफे मथुरा होकर वृन्दावन को गई थीं, वहां एक ब्रह्मचारी बोला कि मैं स्त्री मुख नहीं देखता हूं। मीरा बाई ने कहा वाह महाराज अभी तक स्त्री-पुरुष में ही उलझे हैं, अर्थात समदृष्टि नहीं हुए हैं।
सीताराम शरण भगवान प्रसाद रूपकला अपने ग्रन्थ श्री मीरां बाई जी में लिखते हैं कि - मीरांबाई ने प्रसिध्द महात्मा रूप तथा सनातन गोस्वामी जी के दर्शन किये और जीव गोस्वामी के दर्शनों की अभिलाषा प्रकट की। परन्तु जब सुना कि वे स्त्रियों का मुख देखना तो दूर रहा उन्हें अपने आश्रम में भी घुसने तक नही देते। तब उन्होंने एक पत्रिका लिख भेजी कि - श्री वृन्दावन तो श्री बिहारी जी का रंगमहल रहस्यकुंज है, और वास्तव में तो यहां सब स्त्रियां ही हैं। पुरुष तो एक ब्रजबिहारी श्री कृष्णचन्द्र आनन्दकन्द महाराज मात्र ही हैं। आप विख्यात विवेकी विश महात्मा होते हुए भी अपने आपको यदि पुरुष मानते हो तो जो श्री अन्त:पुरी में आपने स्थान अधिकार किया है, इस निडर साहस की इस आश्चर्यमय घृष्टता की सूचना स्वामिनी श्री राधिका महारानी की सेवा में अभी-अभी क्यों नहीं पहुँचाई जावे? सो आप शीघ्रतर बताने की कृपा कीजिये कि सच ही आप अपने तईं पुरुष मानते हैं? इस पत्रिका को पढक़र गोस्वामी जी की समझ में आ गया कि मीरां कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, वरन् द्वापर की गोपी का अवतार है। तत्काल ही जीव गुंसाई नंगे पांव चल कर मीरा बाई जी से आ मिले।
इसके विपरीत शिशिर कुमार घोष लॉर्ड गौरांग ओर सैल्वेशन फॉर गॉड में मीरां बाई की भेंट रूप गोस्वामी से होना बताते हैं। प्रथम भाग की भूमिका में वह लिखते र्हैं -
"When Mirabai, the Rajput princess, who left everything for her love for Krishna, visited the renowned Rupa Goswami of Vrindaban, one of the chief Bhaktas of Shree Gaurang (Chaitanya)........"
इसी प्रकार गौडीय वैष्णवों में भी इस कथा का पर्याप्त प्रचार है। किन्तु वहां जीव गोस्वामी के स्थान पर उनके चाचा रूप गोस्वामी का नाम लिया जाता है।
स्थान और काल की दृष्टि से इस विसंगति को दूर करने में डॉ सुशील कुमार डे सहायक बनते हैं। संस्कृत काव्यशास्त्र के इतिहास में उन्होंने जीव गोस्वामी का जन्म शाके 1445, सम्वत् 1580 और मृत्यु शाके 1540, सम्वत् 1675 मानी है। कुछ विद्वान उनका जन्म 1570 में मानते हैं। इस प्रकार वे मीरां से दस अथवा उससे भी कुछ अधिक वर्ष छोटे प्रमाणित होते हैं। वृन्दावन गमन के समय वे चालीस वर्ष की थीं। अत: तीस वर्ष से भी कम अवस्था वाले सन्यासी के दर्शन के लिये एक प्रौढ वयस्क भक्त का जाना असंगत लगता है। वह भी तब, जब वृन्दावन में जीव गोस्वामी के परम विख्यात विद्वान और भक्त चाचा रूप गोस्वामी भी उपस्थित हों। यह दूसरी बात है कि कालान्तर में जीव गोस्वामी विद्वता, भंक्ति और प्रसिध्दी में अपने चाचा से आगे निकल गए। लेकिन तब वे एक नवयुवक सन्यासी मात्र थे  ऐसा प्रतीत होता है कि कालान्तर में जीव गोस्वामी की अधिक प्रसिध्दी हो जाने के कारण ही रूप के स्थान पर जीव नाम प्रचलित हो गया होगा।
अपने-अपने संप्रदायों की ख्याति बढाने के लिये मीरां के साथ किये गए सायास अन्याय के ये कुछ उदाहरण मात्र हैं। वस्तुत: मीरां न किसी सम्प्रदाय में दीक्षित हुईं और न ही किसी को गुरु बनाया। स्वयं गिरधारी ही उनके पति, सखा, गुरु, रक्षक आदि सभी कुछ थे। ऐसे अद्वितीय, अनादि ब्रह्म को अपना सर्वस्व सौंप देने के बाद, उस तक पहुंचने के लिये, किसी पंथ की मोह माया में जकडे स्व्यंभू गुरु की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती थी? वे तो अपने मन की वारिधि में, प्रियतम श्रीकृष्ण की छवि बसाये, स्वतन्त्र मीन सी विचरण करती हुई, अन्तत: उसीमें विलीन हो जाने वाली महामना, मनस्विनी, महामानवी थी।

Wednesday, September 9, 2009

भ्रमर गीत

सूरदास

ऊधौ मन ना भये दस-बीस
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ आराधे ईस?
भ्रमर गीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उध्दव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाता है और उध्दव जो हैं योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं उनका प्रेम से दूर दूर का कोई सरोकार नहीं है। जब गोपियाँ व्याकुल होकर उध्दव से कृष्ण के बारे में बात करती हैं और उनके बारे में जानने को उत्सुक होती हैं तो वे निराकार ब्रह्म और योग की बातें करने लगते हैं तो खीजी हुई गोपियाँ उन्हें काले भँवरे की उपमा देती हैं। बस इन्हीं करीब 100 से अधिक पदों का संकलन भ्रमरगीत या उध्दव-संदेश कहलाया जाता है।
कृष्ण जब गुरु संदीपन के यहाँ ज्ञानार्जन के लिये गए थे तब उन्हें ब्रज की याद सताती थी। वहाँ उनका एक ही मित्र था उध्दव, वह सदैव रीति-नीति की, निगुर्ण ब्रह्म और योग की बातें करता था। तो उन्हें चिन्ता हुई कि यह संसार मात्र विरक्तियुक्त निगुर्ण ब्रह्म से तो चलेगा नहीं, इसके लिये विरह और प्रेम की भी आवश्यकता है। और अपने इस मित्र से वे उकताने लगे थे कि यह सदैव कहता है, कौन माता, कौन पिता, कौन सखा, कौन बंधु। वे सोचते इसका सत्य कितना अपूर्ण और भ्रामक है। भला कहाँ यशोदा और नंद जैसे माता-पिता होने का सुख और राधा के साथ बीते पलों का आनंद। और तीनों लोकों में ब्रज के गोप-गोपियों के साथ मिलकर खेलने जैसा सुख कहाँ? ऐसा नहीं है कि द्वारा उध्दव को ब्रज संदेस लेकर भेजते समय कृष्ण संशय में न थे, वे स्व्यं सोच रहे थे यह कैसे संदेस ले जाएगा जो कि प्रेम का मर्म ही नहीं समझता, कोरा ब्रर्ह्मज्ञान झाडता है।
तबहि उपंगसुत आई गए।
सखा सखा कछु अंतर नाहिं, भरि भरि अंक लए।।
अति सुन्दर तन स्याम सरीखो, देखत हरि पछताने ।
ऐसे कैं वैसी बुधी होती, ब्रज पठऊं मन आने।।
या आगैं रस कथा प्रकासौं, जोग कथा प्रकटाऊं।
सूर ज्ञान याकौ दृढ क़रिके, जुवतिन्ह पास पठाऊं।।
तभी उपंग के पुत्र उध्दव आ जाते हैं। कृष्ण उन्हें गले लगाते हैं।
दोनों सखाओं में खास अन्तर नहीं। उध्दव का रंग-रूप कृष्ण के समान ही है। पर कृष्ण उन्हें देख कर पछताते हैं कि इस मेरे समान रूपवान युवक के पास काश, प्रेमपूर्ण बुध्दि भी होती। तब कृष्ण मन बनाते हैं कि क्यों न उध्दव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाए, संदेस भी पहुँच जाएगा और इसे प्रेम का पाठ गोपियाँ भली भाँति पढा देंगी। तब यह जान सकेगा प्रेम का मर्म।
उधर उध्दव सोचते हैं कि वे विरह में जल रही गोपियों को निगुर्ण ब्रह्म के प्रेम की शिक्षा दे कर उन्हें इस सांसारिक प्रेम से की पीडा मुक्ति से मुक्ति दिला देंगे। कृष्ण मन ही मन मुस्का कर उन्हें अपना पत्र थमाते हैं कि देखते हैं कि कौन किसे क्या सिखा कर आता है।
उध्दव पत्र गोपियों को दे देते हैं और कहते हैं कि कृष्ण ने कहा है कि -
सुनौ गोपी हरि कौ संदेस।
करि समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनको उपदेस।।
वै अविगत अविनासी पूरन, सब घट रहे समाई।
तत्वज्ञान बिनु मुक्ति नहीं, वेद पुराननि गाई।।
सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इक चित्त एक मन लाई।
वह उपाई करि बिरह तरौ तुम, मिले ब्रह्म तब आई।।
दुसह संदेस सुन माधौ को, गोपि जन बिलखानी।
सूर बिरह की कौन चलावै, बूडतिं मनु बिन पानी।।
हे गोपियों, हरि का संदेस सुनो। उनका यही उपदेस है कि समाधि लगा कर अपने मन में निगुर्ण निराकार ब्रह्म का ध्यान करो। यह अज्ञेय, अविनाशी पूर्ण सबके मन में बसा है। वेद पुराण भी यही कहते हैं कि तत्वज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसी उपाय से तुम विरह की पीडा से छुटकारा पा सकोगी। अपने कृष्ण के सगुण रूप को छोड उनके ब्रह्म निराकार रूप की अराधना करो। उध्दव के मुख से अपने प्रिय का उपदेश सुन प्रेममार्गी गोपियाँ व्यथित हो जाती हैं। अब विरह की क्या बात वे तो बिन पानी पीडा के अथाह सागर डूब गईं।
तभी एक भ्रमर व
हाँ आता है तो बस जली-भुनी गोपियों को मौका मिल जाता है और वह उध्दव पर काला भ्रमर कह कर खूब कटाक्ष करती हैं।
रहु रे मधुकर मधु मतवारे।
कौन काज या निरगुन सौं, चिरजीवहू कान्ह हमारे।।
लोटत पीत पराग कीच में, बीच न अंग सम्हारै।
भारम्बार सरक मदिरा की, अपरस रटत उघारे।।
तुम जानत हो वैसी ग्वारिनी, जैसे कुसुम तिहारे।
घरी पहर सबहिनी बिरनावत, जैसे आवत कारे।।
सुंदर बदन, कमल-दल लोचन, जसुमति नंद दुलारे।
तन-मन सूर अरपि रहीं स्यामहि, का पै लेहिं उधारै।।
गोपियाँ भ्रमर के बहाने उध्दव को सुना-सुना कर कहती र्हैं हे भंवरे। तुम अपने मधु पीने में व्यस्त रहो, हमें भी मस्त रहने दो। तुम्हारे इस निरगुण से हमारा क्या लेना-देना। हमारे तो सगुण साकार कान्हा चिरंजीवी रहें। तुम स्वयं तो पराग में लोट लोट कर ऐसे बेसुध हो जाते हो कि अपने शरीर की सुध नहीं रहती और इतना मधुरस पी लेते हो कि सनक कर रस के विरुध्द ही बातें करने लगते हो। हम तुम्हारे जैसी नहीं हैं कि तुम्हारी तरह फूल-फूल पर बहकें, हमारा तो एक ही है कान्हा जो सुन्दर मुख वाला, नीलकमल से नयन वाला यशोदा का दुलारा है। हमने तो उन्हीं पर तन-मन वार दिया है अब किसी निरगुण पर वारने के लिये तन-मन किससे उधार लें?
उधौ जोग सिखावनि आए।
सृंगी भस्म अथारी मुद्रा, दै ब्रजनाथ पठाए।।
जो पै जोग लिख्यौ गोपिन कौ, कत रस रास खिलाए।
तब ही क्यों न ज्ञान उपदेस्यौ, अधर सुधारस लाए।।
मुरली शब्द सुनत बन गवनिं, सुत पतिगृह बिसराए।
सूरदास संग छांडि स्याम कौ, हमहिं भये पछताए।।
गोपियाँ कहती र्हैं हे सखि! आओ, देखो ये श्याम सुन्दर के सखा उध्दव हमें योग सिखाने आए हैं। स्वयं ब्रजनाथ ने इन्हें श्रृंगी, भस्म, अथारी और मुद्रा देकर भेजा है। हमें तो खेद है कि जब श्याम को इन्हें भेजना ही था तो, हमें अदभुत रास का रसमय आनंद क्यों दिया था? जब वे हमें अपने अथरों का रस पिला रहे थे तब ये ज्ञान और योग की बातें कहाँ गईं थीं? तब हम श्री कृष्ण की मुरली के स्वरों में सुधबुध खो कर अपने बच्चों और पति के घर को भुला दिया करती थीं। श्याम का साथ छोडना हमारे भाग्य में था ही तो हमने उनसे प्रेम ही क्यों किया अब हम पछताती हैं।
मधुबनी लोगि को पतियाई।
मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिख पठवत जु बनाई।।
ज्यौं कोयल सुत काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाई।
कुहुकि कुहुकि आएं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाई।।
ज्यौं मधुकर अम्बुजरस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातें आई।
सूर जहँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाई।।
कोई गोपी उध्दव पर व्यंग्य करती है।मथुरा के लोगों का कौन विश्वास करे? उनके तो मुख में कुछ और मन में कुछ और है। तभी तो एक ओर हमें स्नेहिल पत्र लिख कर बना रहे हैं दूसरी ओर उध्दव को जोग के संदेस लेके भेज रहे हैं। जिस तरह से कोयल के बच्चे को कौआ प्रेमभाव से भोजन करा के पालता है और बसंत रितु आने पर जब कोयलें कूकती हैं तब वह भी अपनी बिरादरी में जा मिलता है और कूकने लगता है। जिस प्रकार भंवरा कमल के पराग को चखने के बाद उसे पूछता तक नहीं। ये सारे काले शरीर वाले एक से हैं, इनसे सम्बंध बनाने से क्या लाभ?
निरगुन कौन देस को वासी।
मधुकर कहि समुझाई सौंह दै, बूझतिं सांचि न हांसी।।
को है जनक, कौन है जननि, कौन नारि कौन दासी।
कैसे बरन भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी।।
पावैगो पुनि कियौ आपनो, जो रे करेगौ गांसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरो, सूर सबै मति नासी।।

अब गोपियों ने तर्क किर्या
हाँ तो उध्दव यह बताओ कि तुम्हारा यह निर्गुण किस देश का रहने वाला है? सच सौगंध देकर पूछते हैं, हंसी की बात नहीं है। इसके माता-पिता, नारी-दासी आखिर कौन हैं? कैसा है इस निरगुण का रंग-रूप और भेष? किस रस में उसकी रुचि है? यदि तुमने हमसे छल किया तो तुम पाप और दंड के भागी होगे। सूरदास कहते हैं कि गोपियों के इस तर्क के आगे उध्दव की बुध्दि कुंद हो गई। और वे चुप हो गए। लेकिन गोपियों के व्यंग्य खत्म न हुए वे कहती रहीं -
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे।
मूरि के पातिन के बदलै, कौ मुक्ताहल देहै।।
यह ब्यौपार तुम्हारो उधौ, ऐसे ही धरयौ रेहै।
जिन पें तैं लै आए उधौ, तिनहीं के पेट समैंहै।।
दाख छांडि के कटुक निम्बौरी, कौ अपने मुख देहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरे, कौ निरगुन निरवेहै।।
हे उध्दव ये तुम्हारी जोग की ठगविद्या, यहाँ ब्रज में नहीं बिकने की। भला मूली के पत्तों के बदले माणक मोती तुम्हें कौन देगा? यह तुम्हारा व्यापार ऐसे ही धरा रह जाएगा। जहाँ से ये जोग की विद्या लाए हो उन्हें ही वापस सिखा दो, यह उन्हीं के लिये उचित है। यहाँ तो कोई ऐसा बेवकूफ नहीं कि किशमिश छोड क़र कडवी निंबौली खाए! हमने तो कृष्ण पर मोहित होकर प्रेम किया है अब तुम्हारे इस निरगुण का निर्वाह हमारे बस का नहीं।
काहे को रोकत मारग सूधो।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तै, राजपंथ क्यौं रूंथौ।।
कै तुम सिखि पठए हो कुब्जा, कह्यो स्यामघनहूं धौं।
वेद-पुरान सुमृति सब ढूंढों, जुवतिनी जोग कहूँ धौं।।
ताको कहां परैंखों की जे, जाने छाछ न दूधौ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, ब्याज निवैरत उधौ।।
गोपियां चिढ क़र पूछती हैं कि कहीं तुम्हें कुबजा ने तो नहीं भेजा? जो तुम स्नेह का सीधा साधा रास्ता रोक रहे हो। और राजमार्ग को निगुर्ण के कांटे से अवरुध्द कर रहे हो! वेद-पुरान, स्मृति आदि ग्रंथ सब छान मारो क्या कहीं भी युवतियों के जोग लेने की बात कही गई है? तुम जरूर कुब्जा के भेजे हुए हो। अब उसे क्या कहें जिसे दूध और छाछ में ही अंतर न पता हो। सूरदास कहते हैं कि मूल तो अक्रूर जी ले गए अब क्या गोपियों से ब्याज लेने उध्दव आए हैं?
उधौ मन ना भए दस बीस।
एक हुतौ सौ गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।।
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस।
सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस।।
अब थक हार कर गोपियाँ व्यंग्य करना बंद कर उध्दव को अपने तन मन की दशा कहती हैं। उध्दव हतप्रभ हैं, भक्ति के इस अद्भुत स्वरूप से। हे उध्दव हमारे मन दस बीस तो हैं नहीं, एक था वह भी श्याम के साथ चला गया। अब किस मन से ईश्वर की अराधना करें? उनके बिना हमारी इंद्रियां शिथिल हैं, शरीर मानो बिना सिर का हो गया है, बस उनके दरशन की क्षीण सी आशा हमें करोडों वर्ष जीवित रखेगी। तुम तो कान्ह के सखा हो, योग के पूर्ण ज्ञाता हो। तुम कृष्ण के बिना भी योग के सहारे अपना उध्दार कर लोगे। हमारा तो नंद कुमार कृष्ण के सिवा कोई ईश्वर नहीं है।
गोपी उध्दव संवाद के ऐसे कई कई पद हैं जो कटाक्षों, विरह दशाओं, राधा के विरह और निरगुण का परिहास और तर्क-कुतर्क व्यक्त करते हैं। सभी एक से एक उत्तम हैं पर यहाँ सीमा है लेख की।
अंतत: गोपियाँ राधा के विरह की दशा बताती हैं, ब्रज के हाल बताती हैं। अंतत: उध्दव का निरगुण गोपियों के प्रेममय सगुण पर हावी हो जाता है और उध्दव कहते हैं -
अब अति चकितवंत मन मेरौ।
आयौ हो निरगुण उपदेसन, भयौ सगुन को चैरौ
।।
जो मैं ज्ञान गह्यौ गीत को, तुमहिं न परस्यौं नेरौ
।
अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि कैरौ
।।
निज जन जानि-मानि जतननि तुम, कीन्हो नेह घनेरौ
।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जग को बेरौ
।।
कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को देख कर उध्दव भाव विभोर होकर कहते र्हैं मेरा मन आश्चर्यचकित है कि मैं आया तो निर्गुण ब्रह्म का उपदेश लेकर था और प्रेममय सगुण का उपासक बन कर जा रहा हूँ। मैं तुम्हें गीता का उपदेश देता रहा, जो तुम्हें छू तक न गया। अपनी अज्ञानता पर लज्जित हूँ कि किसे उपदेश देता रहा जो स्वयं लीलामय हैं। अब समझा कि हरि ने मुझे यहाँ मेरी अज्ञानता का अंत करने भेजा था। तुम लोगों ने मुझे जो स्नेह दिया उसका आभारी हूँ। सूरदास कहते हैं कि उध्दव अपने योग के बेडे क़ो गोपियों के प्रेम सागर में डुबो के, स्वयं प्रेममार्ग अपना मथुरा लौट गए।
यह है भ्रमर गीत का स्नेहमय सार।